Saturday, May 25, 2019

चीनी टेक्नोलॉजी पर रोक लगाने के लिए अमेरिका ने और ज्यादा कड़े कदम उठाने के संकेत दिए ।

• टेक्नोलॉजी चुराने और अवैध तरीके अपनाने का आरोप
• हाई टेक्नालॉजी, विमानन जैसे क्षेत्रों में घुसपैठ से चिंता ।

अमेरिका-चीन के बीच केवल कारोबार के मामले में तनातनी नहीं चल रही है। दोनों देश हर क्षेत्र में आमने-सामने हैं। मौजूदा तनाव के सामने अमेरिका और पूर्व सोवियत संघ का शीत युद्ध मामूली नजर आता है। अमेरिका की शिकायत है कि चीन टेक्नोलॉजी चुराकर आगे बढ़ रहा है। अमेरिकी सरकार और व्यवसायियों का चीन पर भरोसा टूट चुका है। पिछले सप्ताह टेलीकॉम कंपनी हुवावे पर प्रतिबंध का निर्णय लेकर अमेरिका ने समूची चीनी टेक्नोलॉजी को रोकने के लिए और कड़े कदम उठाने का संकेत दिया है।

अमेरिकी अधिकारी मानते हैं, चीन ने टेक्नोलॉजी हासिल करने के लिए कानून तोड़े हैं। एफबीआई के डायरेक्टर क्रिस्टोफर ने का कहना है, चीन हमारी कीमत पर आश्कि शिखर छूना चाहता है। एजेंसी के 56 फील्ड अधिकारी आर्थिक जासूसी के मामलों की जांच कर रहे हैं। ज्यादातर मामले चीन की तरफ इशारा करते हैं। 2018 में न्याय विभाग ने 15 कंपनियों से व्यापारिक रहस्य चुराने के मामले में एक दर्जन लोगों या संस्थाओं को दोषी पाया है। ये कंपनियां उच्च टेक्नोलॉजी और विमानन क्षेत्र की हैं। चीन के संबंध में अमेरिकी व्यवसायी पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं।
अमेरिकी चैम्बरऑफ कॉमर्स द्वारा फरवरी में चीन में बिजनेस के माहोल पर जारी सर्वे में 70% कंपनियों ने बताया, वे मुनाफे में हैं। लेकिन, आधी अमेरिकी टेक्नोलॅजी कंपनियों ने कह्म, वे बौद्धिक संपदा की अपर्याप्त सुरक्षा के कारण चीन में सीमित  इन्वेस्टमेंट कर रही हैं। कई कंपनियों ने गोपनीय जानकारी देने के लिए दबाव डालने और साइबर हमले की घटनाओं का ब्योरा दिया है।

 छोटे व्यवसायों और उद्यमों पर अमेरिकी सीनेट की कमेटी के प्रमुख मार्क रुबियो ने एक रिपोर्ट में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की मेड इन चाइना 2025 योजना का जिक्र किया है। 2015 में जारी योजना में आर्टिफिशियल इंटेलिजेन्स से विमानन तक उच्च टेक्नोलॉजी के दस क्षेत्रों में देश को ग्लोबल ताकत बनाने का प्रस्ताव है। रुवियो अमेरिका में मैन्युफैक्चरिंग बढ़ाने पर जोर देते हैं।

उनका कहना है, सरकार को अमेरिकी जॉब सुरक्षित करने के लिए कदम उठाने चाहिए। चीन के खिलाफ सख्त कार्रवाई के मामले में रिपब्लिकन पार्टी और डेमोक्रेटिक पार्टी में सहमति है। 2015 के बाद चीन की सरकारी रिसर्च एजेंसियों ने चीनी फमों के लिए कई लक्ष्य तय किए हैं। 2025 तक चीन में बिकने वाले 80% इलेक्ट्रिक वाहन देश में बनाने की योजना है।

असैनिक और सैनिक सहयोग की रणनीति को टेक्नोलॉजी सेक्टरों में बढ़ावा दिया जा रहा है। चीन ने विदेशी प्रतिद्वंद्वियों को बाहर कर इलेक्ट्रिक वाहनों और बैटरियों जैसे क्षेत्रों में बड़े ब्रांड बनाए हैं। संरक्षणवादी नीतियों ने चीनी इंटरनेट कंपनियों के आगे बढ़ने का रास्ता खोला है। 2009 में आय के हिसाब से दस सबसे बड़ी इंटरनेट कंपनियां अमेरिकी थीं। अब कई चीनी कंपनियां इस कतार में हैं। डेटा विश्लेषण और एआई में अमेरिकी कंपनियां अब भी बहुत आगे हैं।

 चीन के बड़े डेटा प्रोजेक्ट अमेरिकी चिप से चलते हैं।
इधर, अमेरिकी रक्षा विभाग पेंटागन के डिफेन्स इनोवेशन बोर्ड ने चेतावनी दी है कि 5  जी मोबाइल टेलीकम्युनिकेशन की होड़ में चीन आगे रहेगा। दस वर्ष पहले अमेरिकी कंपनियों ने 4 जी में बढ़त बनाकर नए हैंडसेट और एप्लीकेशन के मामले में प्रभुत्व कायम कर लिया था। चीन ने सबक सीखते हुए 5 जी नेटवर्क के लिए 12560 अरब रुपए इन्वेस्ट किए हैं। चीन और अमेरिका अपने डिजिटल मार्केट को एक- दूसरे से अलग रखकर विश्व में अन्य स्थानों पर विस्तार करेंगे।

 अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने पहले वैज्ञानिक रिसर्च फंड में कटौती की थी। लेकिन, कंप्यूटर रिसर्च में चीन से आगे निकलने के लिए क्वांटम कंप्यूटर रिसर्च के लिए 90 अरब रुपए  मंजूर किए हैं। दोनों देशों के बीच टेक्नोलॉजी की प्रतिस्पर्धा हथियारों की होड़ में बदल सकती है।

अरबपतियों से भी ज्यादा दान देते हैं आम लोग

अगर हम इंटरनेट खंगालें, जैसा 60 करोड़  भारतीय करते हैं, तो हमें कई बार एक दूसरे के बारे में बुरी और घृणित बातें करते लोग नजर आएंगे। अनजाने में अपने भीतर पनाह दिए हुए द्वेष और घृणास्पद भाषा में कई लोग इसका जवाब देते भी दिखाई देंगे।

शायद इसलिए क्योंकि हमें लगता है कि मुखौटे के पीछे रहकर बुरी बातें कहते हुए हम सुरक्षित हैं। हम एक झूठी पहचान, किसी उपनाम या फिर रूप बदली तस्वीर के पीछे रहते हैं और शक्तिशाली होने का दंभ महसूस करते हैं लेकिन बिना जिम्मेदारी लिए। शायद यह वक्त का एक पहर भर है, जो जल्दी से खत्म हो जाएगा। शायद तिरस्कार, जहर और नफरत सिर्फ लहरें हैं, जो सभ्यता के अथाह सागर की सतह पर हौले से हलचल पैदा कर देती हैं। उस सभ्यता पर जिसे हम भारत कहते हैं।

जिसकी गहराइयों में 5000 साल हैं, संचित ज्ञान, संयम और सहानुभूति है। संभव है कि सतह पर मौजूद हलचल समन्वयात्मक परंपरा को पहचानने में दिक्कतें पैदा करें। वह परपंराएं, जह्यं कई सारी संस्कृतियां आकर मिली हैं और जिससे आज का इंसान तैयार हुआ है। तो द्वेष और नफरत से भरे चुनावी मौसम के बाद आज बात निजी और राजनीतिक दुनिया में एक- दूसरे के साथ गाली-गलौज करने वाले को लेकर नहीं, आज बात होगी मैत्री, करूणा और मुदिता यानी सहृदयता की।

वात अनजानों के साथ नेकी की। हाल ही में बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के साथ मैंने भारत में हर दिन दान को लेकर एक रिसर्च रिपोर्ट तैयार की है। पता चला है कि हमारे देश में सालभर (2017) में आम लोगों ने 34 हजार करोड़ रुपए दान दिए हैं।
 यह दान धार्मिक संस्थानों, समुदायों और आपदा के बाद सहायता के लिए दिया गया है। यह देश के सभी अरबपतियों के दिए दान और केंद्र सरकार की किसी महत्वपूर्ण स्कीम के सालाना बजट से भी ज्यादा है। अनजानों को मदद के विचार का अपना गहरा दार्शनिक अर्थ है। यह मानवता की वह सोच है। जो हर धर्म और जनजाति से भी परे है। यह सर्वव्यापी, मोक्ष पाने से जड़ा ऐसा विचार है जो आम लोगों को प्रयत्न करने की सहूलियत देता है।

जैसे कि यह कुदरती है कि हम अपने पैसे और समय उन लोगों को दें जिन्हें हम जानते हैं, जिनपर भरोसा करते हैं या जो हमारी ही तरह हैं।
वैसा ही कुछ हमारे भीतर अंतर्निहित है कि हम मुश्किल में फसे अनजानों की मदद के लिए भी हमदर्दी रखते हैं। हम संवेदनशील सेते हैं तो उस अनजान व्यक्ति की जगह खुद को देखने लगते हैं। और जिस सहानुभूति की अपेक्षा हमें खुद के लिए होती है हम उसी तरह से व्यवहार करते हैं। लंगर, सेवा, जकात जैस हमारी परंपराएं करोड़ों लोगों के लिए मदान को संभव करने का जरिया बनती हैं। कई परिवारों में घर के बाहर वहां से गुजरने वाले यात्रियों के लिए पानी का मटका भरकर रखने की परिपाटी चली आ रही है। हम सभी ने ऑटो वाले के कीमती सामान लौटाने की कहानियां पढ़ी हैं।

से चमक उठता है। हम संतुष्टि का अनुभव करते हैं, हम जुड़ाव महसूस करते हैं। हावर्ड बिजनेस स्कूल के प्रोफेसर माइकल नॉर्टन ने यूएस से युगांडा तक 130 देशों के डेटा पर रिसर्च किया है। इससे पता चला कि जो लोग दूसरों पर खर्च करते हैं वो उन लोगों से कहीं ज्यादा खुश रहते हैं जो कमाई का मोटा हिस्सा खुद पर लुटा देते हैं।

 यही वजह है कि जॉय ऑफ गिविंग पूरी दुनिया में एक सी अनुभूति है। ऐसी खासियत जो मानव स्वभाव के केंद्र में मौजूद है, फिर चाहे वह किसी भी संस्कृति का हिस्सा हो। नॉर्टन कहते हैं कि जैसे हम सब धी-शक्कर के आदतन हैं वैसे ही हम सबके भीतर दूसरों की मदद का आकर्षण होता है। सौभाग्य से हमारी रिसर्च रिपोर्ट बताती है कि इस सदी के युवा हर रोज दान देने को लेकर ज्यादा उत्सुक रहते हैं।

आमने-सामने मिलकर मार्केटिंग हो या फिर ऑनलाइन क्राउडफंडिंग, छोटी-छोटी मदद वाले ये तरीके हर साल 20-30% बढ़ रहे हैं। तो सही समय आ गया है जब हर रोज देने की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया जाए। भारत का भूगोल उसे बदलते मौसमों वाले क्षेत्र में खड़ा करता है। हम नहीं जानते कब, किस तरह की प्राकृतिक आपदाएं बढ़ जाएगी। साथ ही हमारे यहां बड़ी संख्या में युवा और वेसत्र जनसंख्या है जो आर्थिक असुरक्षा झेल रही हैं।

आपदाओं से पैदा होने वाली दिक्कतों से उबरने के लिए मदद और सहयोग की तैयारी हमेशा रखनी होगी। गैर-परिचितों की मदद उसमें सबसे अहम है। और हमारी रिपोर्ट भी यह्म साबित कर रही है कि हमारे देश में ये परंपरा आबाद है। तो भला इससे बेहतर कौन-सा वक्त होगा भारत की शाश्वत स्नेहपूर्ण धड़कनों को सुनने-सुनाने का?

Friday, May 24, 2019

भाजपा की इस बंपर जीत से भारत की जातिवादी राजनीति की राह मुश्किल

मोदी और अमित शाह ने एक बार फिर इसे कर दिखाया। इन दोनों ने एकतरफा जीत से न केवल कांग्रेस को जबरदस्त झटका दिया, बल्कि जातिवादी राजनीति करने वाले दलों के भविष्य पर भी सवाल खड़े कर दिए। साथ ही भाजपा ने पूर्वी भारत में.बीबीसी के पूर्व पहली बार शानदार उपस्थिति दर्ज कराई और 2019 की इस लहर का अहसास दक्षिण में भी कराया।

 यह चुनाव मोदी के नाम पर लड़ा गया, लेकिन प्रचार के पीछे शाह का ही दिमाग रह्य। परिणाम बताते हैं कि सरकार केपांच सालों के विकास रिकॉर्ड पर आधारित पार्टी के मूल अभियान नामुमकिन अब मुमकिन है, को बालाकोट एयर स्ट्राइक पर आधारित कट्टर हिंदू राष्ट्रवाद पर ले जाना सही फैसला रहा। शुरू से लेकर आखिर तक और प्रचार खत्म होने की रात केदारनाथ की गुफा में बिताकर मोदी ने राष्ट्रवाद में हिंदू तत्व को बनाए रखा। यद्यपि, वह वहां साधना के लिए लिए गए थे, लेकिन उन्होंने भगवा वस्त्रों में गुफा के सामने बैठकर फोटो खिंचवाया।

इस तरह से मोदी ने उस परंपरा को तोड़ दिया, जिसके तहत उनकी पार्टी खुलकर हिंदुत्व के नाम पर वोट मांगने से परहेज करती थी। कांग्रेस के खराब प्रदर्शन से एक बार फिर राहुल के नेतृत्व पर सवाल उठेगा। हालांकि, उन्होंने अपनी पार्टी के लिए काफी मेहनत की, लेकिन एक वक्ता केतौर पर उनका मोदी से कोई मुकाबला नहीं है। गठबंधन पर उन्होंने जो फैसले लिए उससे पार्टी को फायदे की जगह नुकसान ही हुआ। निश्चित तौर पर अगर कांग्रेस और आम आदमी पार्टी दिल्ली में मिलकर लड़ते तो भाजपा को यहां पर वॉकओवर नहीं मिलता। अनेक बार प्रत्याशियों के नाम भी अंतिम क्षणों में घोषित किए गए।

प्रियंका का अचानक ही पार्टी का महासचिव बनना भी कांग्रेस को कुछ नहीं दिला सका और वह अपने भाई राहुल की अमेठी में हर को भी नहीं टाल सकीं। इससे एक बार फिर साफ हो गया कि अब नेहरू-गांधी वंश पहले की तरह वोट खींचने वाला नहीं रहा। पर, यह परिवार कांग्रेस को आज भी एक रखने में सक्षम है। इसलिए प्रियंका के कई बार मना करने के बावजूद एक बार फिर उन्हें पार्टी की कमान सौंपने की मांग उठना लगभग तय है। प्रचार के दौरान राजनीति के पंडितों का कहना था कि भाजपा अपने पिछली बार के प्रदर्शन से पीछे रहेगी और उत्तर प्रदेश में होने वाले नुकसान को उसे ओडिशा व पश्चिम बंगाल से पूरा करना होगा। लेकिन, भाजपा का उत्तर प्रदेश में प्रदर्शन भी बहुत खराब नहीं रहा

और पार्टी ने पूर्वी राज्यों में अपनी शानदार मौजूदगी भी दर्ज करा दी।  बसपा-सपा गठबंधन के निराशाजनक प्रदर्शन ने जाति आधारित राजनीति के भविष्य पर भी सवाल खड़े कर दिए। अगर जाति का गणित देखें तो यह गठबंधन यूपी में भाजपा को पीछे धकेलने में सक्षम था, लेकिन अब लगता है कि मोदी के राष्ट्रवाद ने ऐसी लहर पैदा की, जिसने युवाओं को वोट डालते समय उनकी जाति भूलने को विवशकर दिया। बंगाल में अमित शाह व ममता बनर्जी के बीच लड़ाई काफी कड़वाहट भरी हो गई थी। शाह पिछले पांच सालों से कहरहे थे कि वे बंगाल में भाजपा को दृढ़ता से स्थापित करेंगे। स्पष्ट है। कि भाजपा को उसके काम का फायदा मिला। ममता की पार्टी का सफाया तो नहीं हुआ, लेकिन उनकी सर्वोच्चता को चुनौती तो मिल ही गई।

ऐसा ही ओडिशा के बारे में भी कह्म जा सकता है, जहां पर भाजपा आगे तो बढ़ी पर इतना नहीं कि वह नवीन पटनायक को कुर्सी से उतार सके। लेकिन जब कभी ममता या पटनायक हटेंगे तो मैदान भाजपा को खुला मिलेगा और कांग्रेस उस खाली जगह को भरने की स्थिति में नहीं है। दक्षिण के दो राज्यों में भी इस बार मोदी लहर का असर रहा है। कर्नाटक में जिस बुरी तरह सेकांग्रेस-जद-एस गठबंधन हारा है उसने चौंकाया है। इसके अलावा हैदराबाद और उसके आसपास भाजपा का प्रभाव दिखा है।

 तमिलनाडु में भाजपा कुछ खास नहीं कर सकी और संभवतः उससे साथी चुनने में भी चूक से गई। 2019 में भाजपा ने साबित कर दिया है कि हिन्दुत्व के एजेंडे के साथ एक राष्ट्रीय पार्टी होने की वह से अकेली दावेदार है और कांग्रेस कहीं से भी एक बार फिर राष्ट्रीय पार्टी के तौर पर खुद को स्थापित करते ए नजर नहीं आ रही है।

जातिवादी पार्टियों और राजनीति के भविष्य पर संदेह है, पूर्व में भाजपा के प्रतिद्वंद्वियों का भविष्य भी तय नहीं है, ऐसे में पीएम मोदी के सामने तात्कालिक चुनौती यह है कि वे हिन्दुत्व की इस जीत को विजयोन्माद में बदलने से रोकें।

20% से ज्यादा मुस्लिम वोटरों वाली 96 सीटों में 46 पर भाजपा, कांग्रेस ने 11 सीटें जीतीं।

देश में 20 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम, सिख और ईसाआबादी वाली 130 सीटें हैं। इनमें सर्वाधिक 53 सोटे भारतीय जनता पार्टी ने जीती हैं। दुसरे नंबर पर पश्चिम बंगाल में मुस्लिम बहुलता वाली 14 सीटों के साथ तृणमून कोस है। हालांकि पिछले वर्ष भी उसने यहां 14 सीटे हो जाती थी।

जिन सीटों पर 20 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम हैं, उन 96 सीटों में से भाजपा को इस बार 46 सीटें मिली हैं। जो 2014 के लोकसभा चुनाव से रिकं दो कम है। जक माना जा रह्म था कि उत्तर प्रदेश में भाजपा की सीटें कम होंगी। इतनी मुस्लिम आबादी वाली सीटों में कांग्रेस ने एक सीट के फाख्दे के साथ 11सीटें जीती हैं। वहीं 40 फीसदी से अधिक मुस्लिम वोटरों वाली 29 सीटों में भाजपा, तृणमूल कांग्रेस, उत्तर प्रदेश का महागठबंधन और कांग्रेस 5-5 सीटें जीतने में सफल हुई हैं।

सबसे ज्यादा मुस्लिम येटर्म वाले राज्य उत्तर प्रदेश में 20 फीसदी से अंक मुस्लिम व्हेटरों वाली 28 सेटें हैं इनमें भाजपा को 21 सीटें मिली हैं। 2014 से 7 कम हैं। जबकि पश्चिम बंगाल में भाजपा को इस बार फायदा मिला है। जहां उन्हें 2014 में मुस्लिम आबादी वाली सीटों में एक पर भी कामयाबी नहीं मिली थीं वहीं इस बार उन्हें ऐसी 20 सीटों में से 4 पर जीत मिली है।सिख वोटरों की बात करें तो सबक फायदा कांग्रेस को हुआ है। तीन राज्यों में सिख आबादी वाली 15 सीटें हैं।

 पंजाब की 13 सीटों में से कांग्रेस को 5 स्टें मिली हैं। जबकि भाजपा यहां 4 सीटें जीतने में सफल हो है। दोनों की ही सीटें बढ़ी हैं। वहीं आम आदमी पाटी तीन सीटों के नुकसान के साथ एक सीट पर सिमट गई है। उसे सिर्फ पंजाब के संगरूर की सीट मिली है।

राजस्थान की भी एक सिख आबादी सीट पर भाजपा होती हैं। इस्लाई आबादी वाली सीटों पर भी कांग्रेस को ही सबसे ज्यादा सीटें मिली हैं। हालाकि उसे 2 सीटों का नुकसान हुआ है। 20 फीसदी से ज्यादा इस्लाई आबादी वाली 19 सीटों पर भाजपा को कर और कांग्रेस को 10 सीटें मिली हैं।


जहां अल्पसंख्यक आबादी ज्यादा है वहां की स्थिति मुस्लिम सीटों पर 14 मुस्लिम सांसद
देश की मुस्लिम आबादी वाली सीटों पर कुल 14 सांसद जीते हैं। महाराष्ट्र के औरंगाबाद सीट पर ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम के इम्तियाज जलील सैयद शिवसेना के चंद्रकांत खैरे से करीब 4 हजार मतों से जीते हैं। चंद्रकांत 2014 में डेढ़ लाख से ज्यादा वोट से जीते थे। इनके अलावा फारूख अब्दुल्ला ने श्रीनगर से जीत हासिल की। उन्होंने पीडीपी के सैयद मोहसिन को हराया।

 ऐसी सीटों से जीते तीन चर्चित चेहरे

उत्तर प्रदेश की रामपुर सीट से खड़े हुए समाजवादी पार्टी
के नेता आजम खान ने एक लाख से ज्यादा वोट से भाजपा
की जयाप्रदा को हराया। चुनाव के दौरान ही भाजपा में शामिल हुए सनीदेओल गुरुदासपुर सीट से जीते। उन्होंने कांग्रेस के सुनील जाखड़ को हराया।

सुल्तानपुर सीट छोड़कर इस बार पीलीभीत से लड़ रहे
भाजपा के वरुण गांधी ने सपा के हेमराज वर्मा को करीब
2.55 लाख वोटों से हराया।

बंगाल, यूपी समेत सबसे ज्यादा नए वोटर्स वाले 5 राज्यों में मोदी ने जीती 80% सीटें

युवाः 239 में 190 सीटों पर जीत मिली भाजपा गठबंधन को

इस बार के चुनावों में 8.5 करोड़ वोटर ऐसे थे, जो पहली बार सांसद चुन रहे थे। इनमें बिह्मर, यूपी, मह्मराष्ट्र, मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल में ऐसे युवाओं की संख्या सबसे ज्यादा थी। इन पांच राज्यों की 239 सीटों में से भाजपा और उसके गठबंधन सहयोगियों ने 190 सीटें यानी 80% सीटें। पहली बार वोट डालने वालों की बड़ी तादाद देखते हुए ही पीएम नरेंद्र मोदी ने 9 अप्रैल को महाराष्ट्र के लातूर में कहा था- क्या आपका पहला वोट हवाई हमला करने वालों के लिए से सकता है?

में पहली के वोटरों से कहना चाहता हूँ, क्या आपका पहला वोट वीर जवानों को समर्पित हो सकता है जिन्होंने पाकिस्तान में हवाई हमले किए।' पीएम की अपील  का असर हुआ भी। चुनावों से ठीक पहले सीएसडीएस की ओर से कराए गए सर्वेक्षण में पहली बार वोट डालने जा रहे 50% से ज्यादा युवाओं ने मोदी को फिर से प्रधानमंत्री बनाने की इच्छा व्यक्त  की थी।

भाजपा ने भी इस बार पिछले साल की तुलना में ज्यादा युवाओं को टिकट दिए। इससे मोदी भाजपा युवाओं से जुड़ने में कामयाब रह्म। तेजस्वी सूर्या भाजपा के सबसे युवा सांसद बेंगलुरू साउथ से भाजपा ने 28 वर्षीय तेजस्वी सूर्या को टिकट दिया था, जिन्होंने कांग्रेस के बीके हरिप्रसाद को तीन लाख से ज्यादा वोट से हराया।

महिलाःबीजेपी ने 53 महिलाओं को टिकट दिया, 36 को मिली जीत
2019 आम चुनाव महिलाओं के लिए कई मायनों में खास रहे। इस बार 13 राज्यों में महिला वोटरों की संख्या पुरुष वोटरों से अधिक थी।

नौ राज्यों में महिलाओं ने प्रतिशत के लिह्मज से पुरुषों से ज्यादा वोटिंग की। महिला- पुरुषों के वोटिंग का प्रतिशत भी घटकर 0.4% रह गया। 1962 में महिलाओं और पुरुषों की वोटिंग का अंतर 17% था। जो पिछले चुनावों में 1.4% रह गया था। इस बार पहली बार 76 महिलाएं चुनाव जीतकर लोकसभा में पहुंची हैं।

यानी लोकसभा में उनका प्रतिनिधित्व 2014 के 11.2% से बढ़कर 2019 में 14% हो गया है। इस बार इतिहास में सबसे ज्यादा 724 महिला उम्मीदवार चुनाव लड़ीं। भाजपा ने  53 और कांग्रेस ने 54 महिला प्रत्याशियों को चुनाव मैदान में उतारा था। नई संसद में सबसे ज्यादा 38 महिलाएं भाजपा की होंगी, वहीं कांग्रेस की 6 महिला प्रत्याशियों ने जीत हासिल की। तृणमूल कांग्रेस ने 41% और बीजद ने 33%  टिकट महिलाओं को दिए। तृणमूल की 17 में से ना महिला प्रत्याशी और बीजद को पांच प्रत्याशियों ने जीत हासिल की।

 16 भाजपा महिला सांसदों ने बचाई सीट भाजपा ने 16 महिला सांसदों को चुनाव मैदान में उतारा था, जो सीट बचाने में कामयाब रहीं। कांग्रेस की ओर से सिर्फ सोनिया गांधी ऐसा कर सकी।।

Tuesday, May 21, 2019

कमाई के मामले में रिलायंस ने इंडियन ऑयल को पछाड़ा, 6.23 लाख करोड़ रु. के रेवेन्यू के साथ देश की सबसे बड़ी कंपनी बनी

देश के सबसे अमीर व्यक्ति मुकेश अंबानी के स्वामित्व वाली रिलायंस इंडस्ट्रीज ने एक और बड़ी उपलब्धि हासिल की है। बीते वित्त वर्ष 2018-19 में यह कमाई (रेवेन्यू) के मामले में इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (आईओसी) को पीछे छोड़कर भारत की सबसे बड़ी कंपनी बन गई।

रिलायंस ने 6.23 लाख करोड़ रुपए के रेवेन्यू अर्जित कर यह मुकाम ह्यसिल किया। इंडियन ऑयल 6.17 लाख करोड़ रुपए के रेवेन्यू के साथ दूसरे नंबर पर रही। यह बात इन दोनों कंपनियों द्वारा स्टॉक एक्सचेंजों को दी गई रेगुलेटरी फाइलिंग से सामने आई है। बीते वित्त वर्ष में इंडियन ऑयल का जित एक दशक पहले आईओसी से। आधा था रिलायंस का आकार मुनाफा रह्म, उससे दो गुने से ज्यादा मुनाफे के साथ रिलायंस देश की सबसे अधिक मुनाफे वाली कंपनी भी रही।

इस उपलब्धि के साथ रिलायंस रेवेन्यू, मुनाफे और मार्केट कैप के मामले में देश की सबसे बड़ी कंपनी बन गई है।  करीब एक दशक पहले तक रिलायंस का आकार इंडियन ऑयल के आधे हिस्से के बराबर था। लेकिन इसने बढ़ते ग्राहक आधार पर दांव लगाया। टेलीकॉम, रिटेल और डिजिटल सर्विसेज के कारोबार में उतरी। अपने कारोबार का तेजी से विस्तार किया। बीते वित्त वर्ष 2018-19 में रिलायंस का मुनाफा 39,588 करोड़ रुप रहा। जबकि दूसरी तरफ, इंडियन ऑयल का मुनाफा 17,274 करोड़ रुपए रहा।

2018-19: इंडियन ऑयल का मुनाफा 23.6% घटा, रिलायंस 13% बढ़ा 2017-18 में रिलायंस का मुनाफा 34,988 करोड़ रुपए रहा था

इंडियन ऑयल का मुनाफा ऑयल रिफाइनिंग, पेट्रोकेमिकल्स और गैस बिजनेस के रेवेन्यू  पर निर्भर करता है। बीते वित्त वर्ष में 23.6% घटा है। वर्ष 2017-18 में कंपनी को 22,169.45 करोड़ रुपए का मुनाफा हुआ था। ओएनजीसी 19,945.26 करोड़ रुपए के मुनाफे के साथ दूसरे नंबर पर थी। दूसरी तरफ, वित्त वर्ष में रिलायंस का मुनाफा 13% बढ़ा है। वर्ष 2017- 18 में इसका मुनाफा 34,988 करोड़ रुपए रहा था


 ओएनजीसी बन सकती है सबसे अधिक मुनाफे वाली पीएसयू कंपनी इंडियन ऑयल क्ति वर्ष 2017-18 तक देश की  अधिक मुनाफे वाली पीएसयू कंपनी थी। लेकिन बीते वित्त वशं में ऑक्ल एंड नेचुरल गैस । कॉर्पोरेशन (ओएनजीसी) उसे पीछे छोड़ सकती है। ओएनजीसी ने वित्त वर्ष 2018-19 के नतीजे घोषित.  कहीं किए हैं। लेकिन पिछले वित्त वर्ष के पहले नौ माह में वह 22,671 करोड़ रु. मुनाफा कमा चुकी थी।

पिछले वित्त वर्ष में रिलायंस का रेवेन्यू 44% और इंडियन ऑयल का 30% बढ़ा
मजबूत रिफाइनिंग मार्जिन और मजबूत रिटेल बढ़ा। दूसरी तरफ, वर्ष 2018-19 में देश की सबसे कारोबार के चलते वित्त वर्ष 2018-19 में रिलायंस बड़ी तेल मार्केटिंग कंपनी आईओसी का रेवेन्यू के रेवेन्यू में इससे पिछले साल की तुलना में 44% इससे पिछले साल की तुलना में 30% की दर से की बढ़ोतरी दर्ज की। साथ ही वित्त वर्ष 2009-10 बढ़ा। वित्त वर्ष 2014-15 से 2018-19 के बीच से 2018-19 के बीच नौ साल में 14% की दर से चार साल में 6.3 की रफ्तार से बढ़ा।

भाजपा ने कहा- विशेष सत्र बुलाया जाए नाथ बोले-4 बार बहुमत साबित कर चुके

नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव ने विधानसभा का विशेष सत्र बुलाने के लिए राज्यपाल को लिखा पत्र ,

एग्जिट पोल के नतीजों से प्रदेश में सियासी पारा चढ़ गया है। भाजपा इन नतीजों को लोकसभा चुनाव परिणाम में परिवर्तित होना तय मानते ह्या इसे जनता का कांग्रेस सरकार के प्रति अविश्वास बता रही है और उससे विश्वास हासिल करने की मांग कर रही है। नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव ने विधानसभा का विशेष सत्र बुलाए जाने के लिए राज्यपाल को पत्र लिखा है, जिसमें जनसमस्याओं को लेकर चर्चा कराए जाने की बात कही है।

हालांकि भार्गव के पत्र में फ्लोर टेस्ट कराए जाने का जिक्र नहीं है। दिन भर चले इस घटनाक्रम के बाद शाम को मुख्यमंत्री कमलनाथ ने कहा कि भाजपा पहले दिन से फ्लोर टेस्ट करना की बात कर रह्म है। पिछले पांच महीनों में हमने चार बार अपना बहमत साबित किया है। विधानसभा अध्यक्ष के चुनाव की बात हो या उपाध्यक्ष, अनुपूरक बजट हो या बजट की बात। हमने हमेशा अपना वमत सावित किया। हमे कोई समस्या नहीं है। 

भाजपा का राज्यपाल को काफी  गंभीर समस्याओं से जूझ रहा हैप्रदेश
भार्गव ने राज्यपाल को लिखे पत्र में कहा है कि नई सरकार से करीब 6 महीने हो चुके हैं। इस दौरान प्रदेश में । कई ज्वलंत समस्याएं उत्पन्न हो गई हैं। प्रदेश में पेयजल का गंभीर संकट हो गया है। कानून व्यवस्था बिगड़ गई।  है। किसनों को गेहू-चने का उपार्जन एवं भुगतान नहीं हो पा रहा हैं ऋणमाफी को लेकर किसान अमित और ।परेशान है।

पूर्व से चल रही संमत एवं अन्य लोकप्रिय योजनाओं का लाभ प्रदेश के हितग्राहियों को नहीं मिल पा रहा है। गत 18 फरवरी को एक दो दिन के पत्र में इन सभी विषयों पर चर्चा नहीं हो सकी थी, जिसे प्रदेश का था वर्ग अदलित है। अतः विशेष सत्र बुलाए जाने के लिए मुख्यमंत्री को निर्देशित करने का कष्ट करें।

 सत्र बुलाना जरूरी है?

कोई संवैधानिक बाध्यता नहीं, यह राजनीतिक मागे विधानसभा के पूर्व प्रमुख सचिव वोडी ईसरानी का कहना है कि राज्यपाल को नेता प्रतिपक्ष के पत्र पर सत्र बुलाने की कोई संवैधानिक याध्यता नहीं है। नेता प्रतिपक्ष
 जिन मुद्दों की बात कर रहे हैं। उन पर आगामी सत्र में चर्चा की जा सकती है। यह राजनीतिक मांग है।
सरकार क्या करेगी  तय समय पर ही बुलाया जाएगा विधानसभा सत्र। संसदीय कार्यमंत्री डॉ. गोविंद सिंह ने कहा है कि सरकार भाग्य की मर्जी से नहीं चलेगी। विधानसभा का सत्र भी तय समय  से बुलाया जाएगा। उन शिक्षा मंत्री जीतू पटवारी ने कहा कि यह कमलनाथ की सरकार है, कितने भी फ्लोर टेस्ट करवा लो। भाजपा
के भ्रष्टाचारी बच नहीं सकते।