Saturday, May 11, 2019

चुनावी बहस में जननी सुरक्षा योजना क्यों नहीं? चुनौती हमें नई सरकार से पूछना चाहिए कि मातृ स्वास्थ्य के लिए वह कौनसी नीतियां और कार्यक्रम बनाएगी?

देश में मतदान लगभग पूरा हो चुका है कुछ १२ दिनों में परिणाम भी हमारे सामने सेंगे, इसलिए अब समय है कि सरकार की सफलताओं और असफलताओं का मूल्यांकन शुरू किया जाए और उन चुनौतियों पर ध्यान केंद्रित किया जाए जिसका सामना नई सरकार को करना होगा। इस सरकार ने कुछ प्रमुखकार्यक्रमों को फ्लैगशिप बनाया जैसे कि स्वच्छ भारत और उज्ज्वला योजना। लेकिन मातृ स्वास्थ्य में सुधार लाने के उद्देश्य से चलाए गए दो खास कार्यक्रम, जननी सुरक्षा योजना और प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना को चुनावी बहस में न तो शामिल किया गया और न ही इन पर ज्यादा ध्यान दिया गया।

जननी सुरक्षा योजना एक नकदी हस्तांतरणयोजना है,जिसका उद्देश्य शिशु और मातृ मृत्यु दर  को कम करने के लिए संस्थागत और सुरक्षित प्रसव को प्रोत्साहित करना है। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के एक भाग के रूप में इसे यूपीए सरकार ने 2005 में शुरू किया था, इसे अस्पताल और हेल्थ  केयर सेंटर (संस्थागत प्रसव) में बच्चों के जन्म  की दर में सुधार के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।

2004 से 2014 के बीच, ग्रामीण भारत में संस्थागत प्रसव 35% से बढ़कर 85% से गए हैं। 2014 में सार्वजनिक अस्पतालों में कुल 56% संस्थागत जन्म छुए। एनडीए के तहत इस कार्यक्रम ने एक स्थिर गति बनाए रखी है। सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च द्वारा जुटाए गए आंकड़ों के अनुसार संस्थागत प्रसव, कुल प्रसव के अनुपात में, 2013-14 में 85% से बढ़कर 2017- 18 में 92% हो गए जिसे विकास की दिशा में एक स्थिर गति माना जा सकता है।

13 राज्यों की रिपोर्ट के मुताक्कि 99 प्रतिशत से अधिक प्रस्व अब संस्थान में होते हैं। छत्तीसगढ़, झारखंड और उत्तर प्रदेश जैसे  पिछड़े राज्यों ने भी महत्वपूर्ण प्रगति की है। 2014-
15 में, छत्तीसगढ़ में 74% संस्थागत प्रसव हुए थे जो 2017-18 में बढ़कर 96% से गए। लेकिन क्या इस वृद्धि के साथ ही महिलाओं को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं मिल रही हैं? सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्र पर जाने वाले मरीज या तो सुविधाओं की कमी या फिर डॉक्टर की अनुपस्थिति जैसी समस्याओं का सामना करते हैं।
 अर्थशास्त्री जिष्ण दास और जेफरी हैमर के मुताबिक अगर डॉक्टर मिल भी जाते हैं तो 50 प्रतिशत संभावना
 छेती है कि बीमारी का सही पता नहीं लग पाएगा।

जिष्ण दास के एक अध्ययन के अनुसार मध्यप्रदेश के ग्रामीण
क्षेत्रों में डॉक्टर हर मरीज के साथ औसतन 3.6 मिनट बिताते हैं। मरीज को कम समय देना भी समस्या नहीं
 होती अगर डॉक्टर बीमारी का पता लगा लेते। लेकिन डॉक्टर मरीज से बीमारी के लक्षणों के बारे में नहीं
 पूछते या फिर अनुचित उपचार भी करते हैं। ग्रामीण मप्र में, केवल एक-तिहाई डॉक्टरों ने रोग की पहचान
करने की कोशिश की और केवल 12.2% लोगों की बीमारी का पता चला। यहां तक कि बहुत बेसिक
बीमारियों, जैसे पेचिश से पीड़ित मरीजों में से 12.3% लोगों की सही बीमारी की पहचान हो सकी।

दिल्लीप्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना सशर्त नकद हस्तांतरण प्रदान करने के उद्देश्य वाली मातृत्व लाभ योजना है।
योजना का पहला संस्करण 2010 में शुरू किया गया था और इसे इंदिरा मातृत्व सहयोग योजना कहा जाता
था। इसका का क्रियान्वयन धीमा था। दिसंबर 2016 में, मोदी सरकार ने इस योजना का नाम बदलकर
प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना रखा और इसके पैन इंडिया कार्यान्वयन की घोषणा की। सीपीआर की रिपोर्ट के मुताबिक इसके लिए कम बजट मिला। 2018-19 में, भारत सकार ने इसके लिए 2,400 करोड़ रुपए दिए। 2018-19 के संशोधित बजट में इसे घटाकर 1200 करोड़ कर दिया गया और यह अनुमानित मांग का केवल 49% ही था। इसके तहत 2017 में केवल 20% नामांकन हुए और 2018 में यह बढ़कर 27% तक ही पहुंचा।

 यह विडंबना है कि इस चुनाव में भाजपा और कांग्रेस दोनों ने गरीबों को नकद हस्तांतरण करने के उद्देश्य से बड़े पैमाने पर कार्यक्रमों के वादे किए हैं, लेकिन प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना जैसे मौजूदा नकदी हस्तांतरण कार्यक्रमों की गुणवत्ता और इससे लोगों को    लाभान्वित करने की बात कोई नहीं कर रह्य है। यह हमारी राजनीति की विफलता है। नई सरकार से उम्मीद है कि वह अपनी नीतियों के बारे में स्पष्ट रूप से बताए  और   पीएमएमवीवाई जैसी योजनाओं को लागू करे। कुछ नई नकद हस्तांतरण- जैसे कि पीएम किसान या न्याय लागू होने के बाद, क्या यह योजना जारी रहेगी? और यदि नहूँ तो मातृ स्वास्थ्य के प्रति सरकारों की नीतियां क्या होंगी? यह वह सवाल है जो हमें 23 मई को नई सरकार से पूछना चाहिए।

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