Tuesday, May 14, 2019

चुनाव में श्रीराम', ममता और मोदी की लड़ाई में ध्रुवीकरण ही निर्णायक

कोलकत्ता का कालीघाट। ये दो बत्तों के लिए मशहूर है- प्रसिद्ध काली मंदिर और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का धर। पास में ही अमित जायसवाल की लस्सी की दुकान है। अमित  इसलिए खुश हैं कि ममता के कारण दुकन खुव चलती है क्योंकि यहां सैकड़ों पुलिसकर्मी तैनात रहते हैं जो उनके ग्राहक हैं। अमित एक लाइन में चुनाव के वर्तमान और भविष्य दोनों का आंकलन कर देते हैं- 'भाजपा टक्कर जरूर दे रही है लेकिन जीतेगी दीदी  ही। कोलकाता दक्षिण लोकसभा सीट से ममता चार बार सांसद रह चुकी हैं। इस बार तृणमूल की माला राय और भाजपा के चंद्र  कुमार बोस में टक्कर है। 58 वर्षीय चंद्र कुमार नेताजी सुभाष चंद्र बोस के पड़पोते हैं। इस सोट के भवानीपुरा से ममता विधायक हैं और बाकी छह में से पांच विधायक मंत्री हैं। ममता कह चुकी हैं कि ये हर एक के क्षेत्र का रिजल्ट देखेगी, इसीलिए प्रत्याशी से ज्यादा मेहनत मैत्री कर रहे हैं। कोलकाता दक्षिण की तरह वाकी  सीटों पर ऐसी स्थिति नहीं है। बंगाल के चुनाव में भगवान श्रीराम की एंट्री के बाद ममता-मोदी की लड़ाई में सभी जगह हिंदू- मुस्लिम वोटरों का विभाजन महत्वपूर्ण फैक्टर है।  लंदन में नौकरी कर चुके बोस कोलकाता की बस्तियों में शौचालय नहीं होने जैसी समस्याएं गिनाते हैं और तृणमूल को जिम्मेदार बताते हैं। माला के साथ तृणमूल की फौज है लेकिन ज्यादा जिक्र मोदी का है। क्षेत्र में 20% मुस्लिम वोटर हैं जो तृणमूल के साथ दिखते हैं। माला ने 2014 का चुनाव कठोस के टिकट पर लड़ा था और तीसरे नंबर पर रहीं। सोपीआई (एम) सेमैदन में जाधवपुर यूनिवर्सिटी की प्रो. नंदिनी मुखजी हैं जिन्होंने 2014 में 24% वोट के साथ तृणमूल को टक्कर दी थी। चंद्र कुमार 2016 के विस चुनाव में ममता के सामने उम्मीदवार थे।  कोलकाता उत्तर में इस बार भी तृणमूल के कद्दावर नेता सुदीप बंदोपाध्याय व भाजपा के राष्ट्रीय सचिव राहुल सिन्हा में मुकाबला है। पांचवीं बार मैदान में उतरे सुदीप रोज वैली चिटफंड घोटाले में 2017 में जेल जा चुके हैं लेकिन यह चुनाव में मुद्दा नहीं है। मुद्दा क्या है, यह मुस्लिम बहुल क्षेत्र में तृणमूल की काउंसलर  खातून की तकरीर से समझ सकते हैं। सभा में वे कह रही हैं- ‘उत्तर प्रदेश में हमारे भाइयों के साथ क्या हो रहा है, यह आपको पता है या नहीं। क्या ऐसे ही हालत आप यहां चाहते हैं।

इस क्षेत्र में भी 20% मुस्लिम वोटर हैं। यहां भी वे तृणमूल की ताकत हैं। इसमें सेंध लगाने की कोशिश कर रहे हैं कांग्रेस के सैयद शाहिद इमाम। सीपीआई (एम) से कनिका वोस धोष हैं। यहां काम-धंधे के लिए रह रहे हिंदी भाषी वोटर अहम हैं जो मोदी के नाम पर भाजपा के साथ जा सकते हैं। 2014 में सुदीप (36%) और राहुल (26%) के बीच 10 फीसदी वोटों का अंतर था। निगाहें सीपीएम के वोट पर है जो उपचुनावों में भाजपा की ओर गया था। बांग्लादेश की सीमा से सटे वशीरहाट में हिंदू-मुस्लिम वोटों का विभाजन सबसे ज्यादा हो सकता है। यह निर्णायक भी रहेगा। 2017 में यहां दंगा हुआ था। तब भाजपा ने मैदानी हकीकत का जायजा लेने के लिए तीन सांसदों की कमेटी बनाई थी लेकिन राज्य सरकार ने तीनों को वहां जाने से रोक दिया था। तब भाजपाने इसे मुद्दा बनाया और इलाके में सक्रियता बताई। भाजपा की। तैयारी का जवाब देने के लिए ममता ने सांसद इदरीस अली की जगह बांग्ला फिल्मों की अभिनेत्री 28 वर्षीय नुसरत जहां को उतारा है। यहां 47% मुस्लिम वोट हैं। भाजपा उम्मीदवार श्यांतन बसु के तेवर एक सभा में सीआरपीएफ जवानों को दी गई इस सलाह से समझ सकते हैं - 'कोई बूथ पर कब्जा करने आए तो उनके सीने पर गोली दाग देना। कांग्रेस के काजी अब्दुर रहीम जितने वोट लाएंगे उतना नुकसान नुसरत को ही होना है। बता दें 2014 में चौथे नंबर पर रहे रहीम को 1,02,130 वोट मिले थे।

 बारासात में तृणमूल सांसद डॉ. काकोली घोष दस्तीदार का
मुकाबला भाजपा के डॉ. मृणाल कांति देवनाथ से है। पिछली बार भाजपा ने यहां से जादूगर पीसी सरकार जूनियर को उतारा था। वे 23% वोट के साथ तीसरे नंबर पर थे। लोकप्रियता की वजह से.काकोली की जीत की हैट्रिक रोकना सभी दलों के लिए मुश्किल.ही दिख रहा है। दमदम में तृणमूल के वरिष्ठ नेता प्रो. सौगत राय. का मुकाबला भाजपा के पूर्व विधायक सामिक भट्टाचार्य से हैं।


ऐसे हुई यहां श्रीराम की एंट्री...

• राजनीतिक विज्ञान के प्रोफेसर विमल शंकर नंदा ।.कहते हैं राज्य में करीब 27% मुस्लिम वोटर हैं। इनमें 90% तृणमूल के माने जाते हैं। इस वोट बैंक को और मजबूत करने के लिए ममता ने एंटी-मोदी व एंटी-बीजेपी की अपनी छवि को स्थापित कर लिया है। इसमें मुस्लिमों को भाजपा का डर दिखाने का छिपा हुआ संदेश भी है।

• राजनीतिक विज्ञान के प्रोफेसर विमल शंकर नंदा कहते हैं राज्य में करीब 27% मुस्लिम वोटर हैं। इनमें 90% तृणमूल के माने जाते हैं। इस वोट बैंक को और मजबूत करने के लिए ममता ने एंटी-मोदी व एंटी-बीजेपी.की अपनी छवि को स्थापित कर लिया है। इसमें मुस्लिमों.को भाजपा का डर दिखाने का छिपा हुआ संदेश भी है।

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