मौजूदा आम चुनाव के नतीजे का अनुमान लगाने की कोशिश का कोई फायदा नहीं है। लेकिन जब चुनाव के छह चरण पूरे होकर सिर्फ अंतिम चरण की 59 सीटों पर 19 मई को मतदान होना है, तो ज्यादातर पत्रकारों की तरह मुझे ठीक-ठाक अंदाजा है कि हम किस दिशा में जा रहे।हैं। हम ही नहीं, राजनीतिक दल भी जानते हैं कि क्या।हो रहा है, क्योंकि उनके अपने एग्जिट पोल विश्लेषक.और अपने खास विश्लेषक होते हैं जो इस बारे में।कोई संकेत पाने में लगे होते हैं कि लोगों ने किस तरह मतदान किया है। समस्या मीडिया के एक तबके की है। पिछले.कुछ माह में उन्होंने असमंजस फैलाने की कला में महारत हासिल कर ली है। मतदान शुरू होने से पहले ही मीडिया के इस तबके ने कहना शुरू किया कि मोदी सरकार के लिए दूसरा कार्यकाल तय है। उन्होंने महागठबंधन को लड़ते-झगड़ते छोटे क्षेत्रीय नेताओं का ऐसा गुट बताकर खारिज कर दिया, जो जातिगत समीकरण और अल्पसंख्यक तुष्टिकरण पर दांव लगा रह्म है। जलं तक राहुल गांधी का सवाल है, वे उनकी चुनौती को मजाक बनाने के लिए वे अपनी हद से वाहर चले गए। उनके दृष्टिकोण से वे कोई गंभीर दावेदार नहीं है। 2019 के लिए तो नहीं।इसलिए उनका लगातार एक ही सवाल था : चुनौती देने वाला कौन है? चुनाव लड़ने की अपनी दैत्याकार मशीन और विराट आर्थिक प्रभाव वाली मोदी सरकार का सामना करने का प्रयास करने के पहले अपना नेता तो बताए। यदि नेता नहीं है तो फिर पूरा विपक्ष किसके पीछे एकजुट होने के लिए तैयार है, आप मोदी को चुनौती देने की हिम्मत क्यों कर रहे हैं?
ऐसा कहते हुए यह तक्का ठीक-ठीक जानता था कि चुनाव होने के पहले ही ऐसे नेता की खोज जो हर पार्टी में हर व्यक्ति को स्वीकार्य हो, यह सुनिश्चित करने का पक्का तरीका है कि विपक्ष कभी एकजुट न हो पाए। सौभाग्य से विपक्ष ने इसकी उपेक्षा कर दी। नेता की तलाश करने की बजाय, इसने सरल से. व्यावहारिक गठबंधनों पर गौर किया और वह भी प्रादेशिक स्तर पर। ज्यादातर गठबंधन हो भी गए। ये इतनी जल्दी या कि मोदी सरकार के लोग उन्हें होने से रोक नहीं पाए। सबसे बडा गठबंधन तो उत्तप्रदेश में सपा-बसपा गठबंधन रहा। लेकिन, मीडिया को उसमें राहुल का अकेले पड़ जाना और देश के सबसे बड़े राज्य में कांग्रेस का अंत। दिखाई दिया। उन्होंने इस तथ्य की अनदेखी कर दी कि। कुछ ही समय पहले राहुल ने अपने पार्टी की तीन हिंदी प्रदेशों- मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में जीत। का नेतृत्व किया है और जद (एस) के साथ कर्नाटक। में सत्ता ह्मसिल की है। यह उस व्यक्ति के लिए खराब नहीं है, जिसे पप्पू बताकर खारिज कर दिया गया हो। कुछ गठजोड़ नहीं चले लेकिन, इसकी तो अपेक्षाथी है। पिछले पांच वर्षों में हम आदेशों से चलने वालेःशासन के इतने आदी से गए हैं कि लोकतंत्र का मूलचरित्र ही भूल गए। ऐसी नाकामियां तो होंगी ही,
क्योंकिलेकिन, फिर वही तो कीमत है जो हम मजबूत सरकार की
चुकाते हैं, ऐसी सरकार जो खुद के सिवाय किसी की नहीं
सुनती। इतिहास ने हमें दिखाया है कि गठबंधन विल्कुल
ठीक काम करते हैं। वे अच्छा काम करते हैं, क्योंकि।उनका इरादा तानाशाहो का नहीं होता। इससे महत्वपूर्ण।यह है कि वे ऐसे अच्छे लोगों की आकांक्षाओं को बढ़ावा।देती है, जो समान लक्ष्य के लिए साथ मिलकर काम।करने को तैयार हैं। आप इसे टकराव वाली सरकार के रूप में भी देख सकते हैं या आप उसे वह मान्यता दे.सकते हैं, जो असल में यह है। एक खुली राजनीति, जहां.विभिन्न नेता साथ रह सकते हैं. वहम कर सकते हैं. अपने।विश्वास के लिए लड़ सकते हैं, उसका बचाव कर सकते हैं और इस तरह जनता के विमर्श को आगे ले जाते हैं।।मर्दानगी एक विलेन है।
जब हम एक ही व्यक्ति को.इतनी शक्ति दे देते हैं तो चेक्स एंड वैलेंसेस के उपाय।नदारद हो जाते हैं। संस्थानों के साथ समझौता होने लगता।है। पूरी शक्ति अंतिम रूप से केंद्रीकृत हो जाती है। संघीय.व्यवस्था ढह जाती है। भारत को आज शिद्दत से ऐसा।नेता चाहिए, जिसमें करुणा हो, वह बुद्धिमान हो, ऐसा।नेता जो दूसरों की सलाह स्वीकारने के लिए राजी हो। हमें।ऐसा व्यक्ति चाहिए.जो दूसरों की राय को सुनता हो। ऐसा व्यक्ति जो अपनी ही उपलब्धियों को शेखी नहीं बधारता।बल्कि दूसरों को उससे अधिक उपलब्धि हासिल करने.के लिए प्रोत्साहित करता है। ऐसा नेता जो हमें इस कृषि.संकट, वेरोजगारी, सांप्रदायिकता, ढहती अर्थव्यवस्था के।अंधकारपूर्ण व डरावने परिदृश्य से बाहर निकाले। अब।नए विमर्श का वक्त है। यह बदलाव का, अपनी दिशा ठीक करने का वक्त है। घावों को भरने का वक्त है।
ऐसा कहते हुए यह तक्का ठीक-ठीक जानता था कि चुनाव होने के पहले ही ऐसे नेता की खोज जो हर पार्टी में हर व्यक्ति को स्वीकार्य हो, यह सुनिश्चित करने का पक्का तरीका है कि विपक्ष कभी एकजुट न हो पाए। सौभाग्य से विपक्ष ने इसकी उपेक्षा कर दी। नेता की तलाश करने की बजाय, इसने सरल से. व्यावहारिक गठबंधनों पर गौर किया और वह भी प्रादेशिक स्तर पर। ज्यादातर गठबंधन हो भी गए। ये इतनी जल्दी या कि मोदी सरकार के लोग उन्हें होने से रोक नहीं पाए। सबसे बडा गठबंधन तो उत्तप्रदेश में सपा-बसपा गठबंधन रहा। लेकिन, मीडिया को उसमें राहुल का अकेले पड़ जाना और देश के सबसे बड़े राज्य में कांग्रेस का अंत। दिखाई दिया। उन्होंने इस तथ्य की अनदेखी कर दी कि। कुछ ही समय पहले राहुल ने अपने पार्टी की तीन हिंदी प्रदेशों- मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में जीत। का नेतृत्व किया है और जद (एस) के साथ कर्नाटक। में सत्ता ह्मसिल की है। यह उस व्यक्ति के लिए खराब नहीं है, जिसे पप्पू बताकर खारिज कर दिया गया हो। कुछ गठजोड़ नहीं चले लेकिन, इसकी तो अपेक्षाथी है। पिछले पांच वर्षों में हम आदेशों से चलने वालेःशासन के इतने आदी से गए हैं कि लोकतंत्र का मूलचरित्र ही भूल गए। ऐसी नाकामियां तो होंगी ही,
क्योंकिलेकिन, फिर वही तो कीमत है जो हम मजबूत सरकार की
चुकाते हैं, ऐसी सरकार जो खुद के सिवाय किसी की नहीं
सुनती। इतिहास ने हमें दिखाया है कि गठबंधन विल्कुल
ठीक काम करते हैं। वे अच्छा काम करते हैं, क्योंकि।उनका इरादा तानाशाहो का नहीं होता। इससे महत्वपूर्ण।यह है कि वे ऐसे अच्छे लोगों की आकांक्षाओं को बढ़ावा।देती है, जो समान लक्ष्य के लिए साथ मिलकर काम।करने को तैयार हैं। आप इसे टकराव वाली सरकार के रूप में भी देख सकते हैं या आप उसे वह मान्यता दे.सकते हैं, जो असल में यह है। एक खुली राजनीति, जहां.विभिन्न नेता साथ रह सकते हैं. वहम कर सकते हैं. अपने।विश्वास के लिए लड़ सकते हैं, उसका बचाव कर सकते हैं और इस तरह जनता के विमर्श को आगे ले जाते हैं।।मर्दानगी एक विलेन है।
जब हम एक ही व्यक्ति को.इतनी शक्ति दे देते हैं तो चेक्स एंड वैलेंसेस के उपाय।नदारद हो जाते हैं। संस्थानों के साथ समझौता होने लगता।है। पूरी शक्ति अंतिम रूप से केंद्रीकृत हो जाती है। संघीय.व्यवस्था ढह जाती है। भारत को आज शिद्दत से ऐसा।नेता चाहिए, जिसमें करुणा हो, वह बुद्धिमान हो, ऐसा।नेता जो दूसरों की सलाह स्वीकारने के लिए राजी हो। हमें।ऐसा व्यक्ति चाहिए.जो दूसरों की राय को सुनता हो। ऐसा व्यक्ति जो अपनी ही उपलब्धियों को शेखी नहीं बधारता।बल्कि दूसरों को उससे अधिक उपलब्धि हासिल करने.के लिए प्रोत्साहित करता है। ऐसा नेता जो हमें इस कृषि.संकट, वेरोजगारी, सांप्रदायिकता, ढहती अर्थव्यवस्था के।अंधकारपूर्ण व डरावने परिदृश्य से बाहर निकाले। अब।नए विमर्श का वक्त है। यह बदलाव का, अपनी दिशा ठीक करने का वक्त है। घावों को भरने का वक्त है।
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