Showing posts with label History. Show all posts
Showing posts with label History. Show all posts

Friday, May 10, 2019

हूणों का आक्रमण के बारे में जानकारी

हुन मध्य एशिया की खानाबदोश जाति थी। जिन्होंने पांचवीं शताब्दी ई. में भारत पर आक्रमण किया। हुणों का पहला आक्रमण 455 ई. में हुआ। स्कन्दगुप्त ने इसे पीछे
धकेल दिया। हूण आक्रमण ने गुप्त अर्थव्यवस्था को आर्थिक संकट में डाल दिया। जिससे गुप्तों को अपने सिक्कों में मिलावट करनी पड़ी।500 ई. के आस-पास हूणों का नेता तोरमाण मालवा का स्वतंत्र शासक बन गया।

धन्य विष्णु के एरण (मालवा) के वराह अभिलेख में भी तोरमाण का जिक्र आता है।  तोरमाण के छोटे ताँबे के सिक्के पंजाब व उत्तरप्रदेश से प्राप्त होते हैं। हूणों ने केवल ताँबे व चाँदी के सिक्के चलाए । | कुरा अभिलेख से भी तोरमाण का जिक्र मिलता है। कुरा अभिलेख  व तोरमाण की रजत मुद्राओं पर पाहि-जउब्ल की उपाधि मिली। जउब्ल तुर्की भाषा का शब्द है जिसका अर्थ सामन्त होता है।

षाहि उपाधि कुषाणों की थी। तोरमाण के सेनापति कराल ने साकल (स्यालकोट) को अपनी राजधानी बनाया। तोरमाण के पुत्र मिहिरकुल को औलिकर वंशीय मालवनरेश यशोधर्मा एवं मगध के गुप्त शासक नरसिंहगुप्त बालादित्य ने परास्त किया।

तोरमाण के पुत्र मिहिरकुल को औलिकर वंशीय मालवनरेश
यशोधर्मा एवं मगध के गुप्त शासक नरसिंहगुप्त बालादित्य ने परास्त किया। मंजूश्री मूलकल्प के अनुसार मिहिरकुल को बन्दी बना लिया गया किन्तु बालादित्य की माँ के कहने पर उसे छोड़ दिया गया। मिहिरकुल शैव मतावलम्बी था। उसके सिक्कों पर नन्दी का चित्रं तथा जयतु वृषभ अंकित मिलता है। मन्दसौर प्रशस्ति से भी उसके शैव होने की पुष्टि होती है।

मिहिरकुल बौद्ध धर्म का कट्टर शत्रु था। मालवा नरेश यशोधर्मा की मन्दसौर प्रशस्ति की रचना वासुल ने की। इसमें यशोधर्मन् (यशोधर्मा) द्वारा हूण शासक मिहिरकुल को परास्त करने का वर्णन है। मन्दसौर प्रशस्ति में यशोधर्मा को जनेन्द्र कहा गया है। गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद विकेन्द्रीकरण और क्षेत्रीयता की भावना का विकास हुआ। भूमि अनुदान की प्रथा में तेजी आई। जिससे सामन्तवाद का विकास हुआ। केन्द्रीय सत्ता कमजोर हुई तथा क्षेत्रीय राजवंशों का उदय हुआ। गुप्त वंश के पतन के बाद निम्नलिखित क्षेत्रीय राजवंशों का उदय हुआ।

       1. वल्लभी के मैत्रक :-
इन्होंने गुप्तोत्तर काल के राजवंशों में सबसे लम्बे समय के लिए शासन किया। भट्टार्क व धर्मसेन इनके प्रमुख शासक थे। वल्लभी संवत् तथा गुप्त संवत् दोनों ही 319 ई. में शुरू हुये। वल्लभी शासक गुप्त संवत् का प्रयोग करते थे। 2. कन्नौज के मौखरि :- इस वंश की स्थापना हरिवर्मा ने की तथा 554 ई. के आस-पास इस वंश का ईशानवर्मा शक्तिशाली शासक हुआ।

ईशानवर्मा के बाद सर्ववर्मा, अवन्तिवर्मा व ग्रहवर्मा शासक हुआ। ग्रहवर्मा इस वंश का अंतिम शासक था। उसने थानेश्वर के प्रभाकरवर्धन की पुत्री राज्यश्री से विवाह किया। ग्रहवर्मा को मालवा के राजा देवगुप्त ने मार डा। रहा अभिलेख (बाराबंकी, उत्तरप्रदेश) से मौखरि वंश की जानकारी मिलती है।


         3. मालवा व मगध के परवर्ती गुप्त :-
महासेन गुप्त प्रमुख परवर्ती गुप्त शासक था। हर्षवर्धन की दादी महासेन गुप्त इसकी बहिन थी।
       

            परवर्ती गुप्तों की जानकारी के स्रोत :-
अफसढ़ का लेख :- यह बिहार के गया जिले के अफसढ़ नामक स्थान से मिला है। जिसमें उत्तर गुप्त वंश के आदित्य सेन तक के शासकों का इतिहास वर्णित है। इसमें उत्तर गुप्त एवं मौखरि शासकों के पारस्परिक संबंधों का भी वर्णन मिलता है। देवबर्नाक (शाहबाद-आरा, बिहार) का लेखः- इस लेख से भी उत्तर गुप्त वंश के तीनों शासकों की जानकारी मिलती है।

उत्तर गुप्त वंश का संस्थापक कृष्णगुप्त (लगभग 510-525 ई.) था। मगध के उत्तर गुप्तवंशी शासक मालवराज महासेन गुप्त के दो पुत्र कुमारगुप्त तथा माधवगुप्त वर्धन दरबार में रहते थे। हर्षवर्धन का बचपन इन दोनों राजकुमारों व ममेरे भाई भण्डी के साथ बीता था।

                 4. बंगाल के गौड़ :-
शशांक प्रमुख गौड़ शासक था। हर्षवर्धन से उसकी शत्रुता थी। शशांक बौद्ध धर्म का विरोधी था। इसने गया में बोधिवृक्ष को कटवाकर गंगा नदी में फिंकवा दिया। ह्वेनसांग शशांक को काचेचांग कहता है तथा उसे कर्ण सुवर्ण का शासक बताता है। बाण इसे गौड़ का राजा बताता है। कर्ण सुवर्ण शशांक की राजधानी थी। थानेश्वर के पुष्य इन्होंने गुप्तों के बाद उत्तर भारत में सबसे विशाल राजवंश की सथापना की। ह्वेनसांग तथा आर्यमंजूश्रीमूलकल्प के अनुसार वर्धन वंश (पुष्यभूति वंश) वैश्य जाति का था।